करन सिंह का खुला पत्र

आम आदमी पार्टी के समर्पित कार्यकर्ताओ , सदस्यों , शुभचिन्तको , समर्थकों व पदाधिकारियों के नाम एक वालंटियर का खुला पत्र।

साथियो ,
आज देश की राजनीति जिस दोराहे पर खड़ी है वहां से एक राह, बड़े बेहतर कल की ओर जाती है और दूसरी अंधकार भरे भविष्य की ओर, अब तय आपको करना है ।

आप” का चिट्ठी युद्ध देश में अच्छी राजनीति के लिये संघर्ष और त्याग करने वाले सभी साथियो के लिये एक wake up call है । इस घटना को नजरंदाज करने का मतलब देश की राजनीति को सुधारने का सुनहरा मौका छोड़ देना है | अब यह बिलकुल साफ़ हो गया है कि बीमारी का समय रहते इलाज ना करने से बीमारी बढती है और फिर ला इलाज हो जाती है , और इसे केवल दूसरों की समस्या समझने वाले लोग एक दिन खुद इसका शिकार हो जाते हैं ।

एक गैर राजनीतिक आदमी होते हुए भी मेरा ‘आप’ के साथ पिछले तीन साल का अनुभव यह दर्शाता है कि, चाहे कितनी भी नई पार्टियां बना ली जाए, पर आंतरिक लोकतंत्र और संगठन को मजबूत किये बगैर पार्टी को उसकी मूल भावना, सिद्धांत एवं दिशा से भटकने से नहीं रोका जा सकता

24 दिसम्बर 2012 में ‘आप’ से जुड़ते हुए कुछ ऐसी ही आशंका थी की कहीं यह पार्टी अपनी दिशा से न भटक जाए ।इसलिए पहली ही मुलाकात में अरविन्द जी से वादा लिया था कि वो ऐसा नहीं होने देंगे । उस दिन उन्होंने पार्टी की “स्वराज “ और “लोकतांत्रिक भागीदारी “ पर आधारित विचारधारा का हवाला देते हुए यह विश्वास दिलाया था की यह पार्टी अपने मूल सिद्धान्तों से नहीं भटकेगी ।

समय के साथ जब यह अहसास हुआ कि सत्ता प्राप्ति के लिये पार्टी की मूल विचारधारा से समझौता हो रहा है और उचित–अनुचित का भेद नहीं रह गया है तो हर संभव मौके पर , हर संभव तरीके से अरविन्द जी को आग्रह किया , प्रार्थना की, समय रहते सही कदम उठाने के लिए, लेकिन शायद उनकी नज़र में सत्ता प्राप्ति का लक्ष्य उचित–अनुचित से ऊपर था ।

परन्तु यह प्रश्न है कि उचित और सिद्धान्तिक तरीके से चलने को सत्ता प्राप्ति की राह का रोड़ा क्यों माना जा रहा था और कब तक माना जाता रहेगा ?
अभी किए गये समझोतों की सत्ता प्राप्ति के बाद कोई बड़ी कीमत आखिर क्यों नहीं चुकानी पड़ेगी ?

अप्रैल 2013 से लेकर 21 जुलाई 2014 तक दिए गये किसी भी सुझाव पर कुछ नहीं किया गया । मानो जैसे कार्यकर्ताओ की चिंताओ से सरोकार ही न हो कोई ।

8 जून 2014 को किराड़ी विधानसभा छेत्र में जो हुआ उसके बाद के घटनाक्रम ने मुझे अंदर तक हिलाकर रख दिया | अब चुनौती यह साबित करने की थी कि छोटे-छोटे समूहों में अपनी चिंता जताने आने वाले कार्यकर्ता ना तो भ्रमित है और ना ही स्वार्थी  । चुनौती थी एक  ऐसा तरीका तलाशने की जिस से अरविन्द जी तक यह सन्देश पहुँच सके की लगभग सभी कार्यकर्ताओ की चिंताए एक सी है ।इसी जद्दोजहद में और अपने दायित्व के अधिकारों के दायरे में रहते हुए एक पहल की गई, उसका नाम था, “AVAM” यानि आम आदमी पार्टी वालंटियर एक्शन मंच

परन्तु इस से पहले की इस पहल को सब वालंटियर्स की स्वीकृति मिल पाती ,  कुछ लोग असुरक्षित महसूस करने लगे और उन्होंने हर हाल में AVAM को बदनाम करने की ठान ली । कौन थे वो लोग ?

परन्तु पार्टी के भविष्य को ध्यान में रखते हुए कार्यकर्ताओ को सजग व संगठित करना अति आवश्यक था । क्योंकि पार्टी को अपने आंतरिक विरोधाभास के चलते गहरे संकट में फसने से अगर कोई बचा सकता है तो वो है सजग, सक्रीय व ‘संगठित कार्यकर्ता’ , न की अंधभक्त या चालबाज़ पदाधिकारी ।पार्टी के कई महत्वपूर्ण निर्णयों में कार्यकर्ताओ की भागीदारी सुनिश्चित करना ज़रूरी था, है, और सदा रहेगा ।

अगर कार्यकर्ताओ की वोटिंग से चुनी हुई National Executive और PAC बनेगी तो वो सीधे कार्यकर्ताओ के प्रति जवाब देय होगी व उनके फैसले सही मायनों में कार्यकर्ताओ की भावना के अनुरूप होंगे । साथ ही यदि Right to Recall की लगाम भी कार्यकर्ताओ के हाथ हो तो कभी भी 20-25 लोग इन समितियों को अपने स्वार्थ की राजनीति का अखाडा नहीं बना पाएंगे ।

लेकिन इसी वजह से कई स्वयंभू नेता असुरक्षित हो गए और उन्होंने आवाम को बदनाम करने के लिए उसे बगावत का नाम देने का षड्यंत्र रचा । उसे सभी ने ख़ामोशी से देखा । बिना किसी सबूत के  उस षड्यंत्र में ‘दिल्ली प्रदेश अनुशासन समिति’ भी शामिल हो गई या फिर यूं कहें षड्यंत्र को न्यायिक कार्यवाही दिखाने के लिए इसका गठन किया गया ।जहां पूर्वनिर्धारित फैसले से दूर की सोच–समझ देने वाले को ही बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। उपर से उसकी अपील पर ‘राष्ट्रीय अनुशासन समिति’ को कार्यवाहि तक नहीं करने दी गई ।

इस षड्यंत्र के तहत Dirty Tricks Department (DTD) ने क्या कुछ नहीं किया । Social Media में बेबुनियाद आरोप लगाए , लेकिन निष्पक्ष लोग चुप रहे । झूठे sms द्वारा आवाम का नाम BJP से जोड़ने के लिये पार्टी वोलंटियर डाटा का दुरूपयोग किया गया , निष्पक्ष लोग या तो चुप रहे या आवाम को नसीहत देने लगे । मामले को गहराई से जाने समझे बिना वे मानते रहे की वे पार्टी के अंदर ही आवाज़ उठाकर पार्टी की दशा दिशा भी सुधार  लेंगे । वालंटियर्स ने हर नेता से मिल कर हकीकत समझाने की कोशिश की मगर, कुछ चुप रहे, कुछ ने कहा चुप रहो। कुछ ने कहा अभी थोड़ा इंतज़ार करो , योगेंदर जी ने कहा घर से बाहर बात मत करना और उनके देखेते-देखते हमें हमारे ही घर से निकाल दिया गया। इसके साथ ही दिखी एक बेचैनी कहीं किसी ने आवाम से मिलते देख लिया तो …..|

फिर गाँधी और अन्ना के जीवन से प्रेरणा लेते हुए समझा की “सत्य परेशान तो हो सकता है पर परास्त नहीं”। सीधे कार्यकर्ताओ तक सन्देश पहुँचाने के मकसद से आवाम ने पार्टी की जन्म भूमि पर शुरू किया “स्वराज सत्याग्रह “ जो 16 अगस्त से 2 अक्टूबर तक पुरे 48 दिन चला , मगर सब चुप रहे

“नतीजा मिला फर्जी स्टिंग और बेहतरीन एडिटिंग जिसमे आवाम को पैसे लेते दिखाया गया ” जिसके रॉ फुटेज के दम पर पार्टी को ब्लैक मेल करके राजेश गुप्ता जी वजीरपुर विधानसभा से टिकट ऐंठने में सफल रहे ।निष्पक्ष लोग चुप रहे , बल्कि आवाम को शक की नज़र से देखने लग गये ।

फिर हुई दिल्ली चुनाव की घोषणा, आवाम ने समय रहते पार्टी के सभी नेताओं को पत्र लिखा  , कहा, अगर BJP-Congress के गलत लोगों को टिकट दिया तो आवाम विरोध करेगा । सब चुप रहे , मगर इस बार प्रशांत भूषण जी ने कदम उठाया और 12 दागी उम्मीदवारों की लिस्ट जनवरी 2015 में पार्टी को थमा दी , सभी ने  कहा “अभी चुप रहो”। सब चुप हो गए ।

फिर माननीय आशीष खेतान जी की मेहरबानी की वजह से 2 मार्च को ऐरा-गैरा-नथु-खेरा ‘आवाम’ बोला और सारे देश ने सुना,  दो करोड़ के चंदे का गोरख धंधा । प्रशांत जी के अलावा बाकि सभी बोले, और असली मुद्दे को छोड़ ‘समय और नियत’ को मुद्दा बनाने में पार्टी कर्णधारो ने अपनी पूरी ताकत झोक दी और सारे देश की नज़र में आवाम  को BJP का षड्यंत्र साबित कर देने की पूरी कोशिश करी । AAP को उम्मीद से और अधिक सीटें मिली , पर क्या AVAM को न्याय मिला ?

आख़िरकार 26 फ़रवरी को प्रशांत जी के एक साहसिक पत्र से सच सामने आया जिससे DTD घबराया । सभी ने मिलकर जज को ही हटाने का षड़यंत्र रच डाला जो 4 मार्च को आप सब ने देखा । क्या हमें अब भी खामोश रहना चाहिए ? क्या DTD को कभी साजिश करने की सजा मिलेगी ? क्या आशीष खेतान हमसे अभद्र व्यवहार के लिए सार्वजनीक माफ़ी मागेंगे ?

क्या हमारी आवाज केवल इसलिए नहीं सुनी जायेगी क्योंकि हम कोई नेता नहीं है, केवल एक कार्यकर्ता हैं ? एक कार्यकर्त्ता न्याय के लिए कहा जाए ?

आवाम की नज़र में यह पार्टी भारत के बेहतर भविष्य का सपना है किसी व्यक्ति या समहू की जागीर नहीं ।ये हमारा घर है और इसे साफ़ किये बिना देश की राजनीति और व्यवस्था को साफ करने की बात सोचना ही बेमानी है , एक खोखला सपना है । एक कीचड़ सने रुमाल से मुँह पोछनें जैसा है ।एक तरफ DTD के अनेतिक हथकंडे और दूसरी तरफ निष्पक्ष लोगो की चुपी , धीरे-धीरे सभी सही सोच वाले लोगो को बाहर का रास्ता दिखा कर रहेगी

“संगठन की बात बाद में पहले दिल्ली चुनाव । संगठन का काम बाद में पहले लोकसभा चुनाव । संगठन का करेंगे क्या अगर दिल्ली फिर से नहीं जीत पाए ।”  ऐसे कमज़ोर बहाने और कब तक सुनते रहेंगे । आज ‘आप’ को तय करना है अगर अब भी आप नहीं जागे और एकजुट नहीं हुए तो इस पार्टी का पूरी तरह से भ्रष्ट हो जाना तय है और इस पार्टी के पतन के लिए आप स्वयं जिम्मेदार होंगे। आवाम तो जागरूक, एकजुट कार्यकर्ताओ की आवाज़ पुरजोर तरीके से उठाता रहेगा , क्योंकि आवाम का मानना है की देश की दिशा ठीक करने का पहला कदम है खुद को ठीक करना है ।

आवाम को पूरा भरोसा है की वक्त के साथ आप आवाम के सच को ज़रूर समझेगे और हम सब पर फक्र करेंगे । तब तक चाहे कोई कुछ भी सोचे , कुछ भी कहे  हम अपना कर्म करते रहेंगे | चाहे हमें अकेले ही यह कार्य क्यों ना करना पड़े ।

” लक्ष्य प्राप्ति से पहले ‘न हम रुकेंगें ,न हम झुकेगें ‘।”

सत्यमेव जयते

करन सिंह
( एक सजग कार्यकर्ता )

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